मुलक सूं पलकियो काढ माता!! – विरधदानजी बारठ

।।गीत।।
उरड़ अणतार बिच वार करती इधक,
बीसहथ लारली कार बगती।
आंकड़ै अखूं आधार इक आपरो,
सांकड़ै सहायक धार सगती।।

त्रिमागल़ रोड़ती थकी आजै तुरत,
आभ नै मोड़ती मती अटकै।
रसातल़ फोड़ती थकी मत रहीजै,
गोड़ती समुंदरां असुर गटकै।।[…]

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।।कहाँ वे लोग, कहाँ वे बातें।। – राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा (सीकर)

ऐक बार डीडिया गांव के न्यायाधीस श्रीमान लक्ष्मीदानजी सान्दू साहब से मिलने हेतु श्रीमान अक्षयसिंहजी रतनू साहब गये। उस समय जज साहब ने कहलवाया कि मेरे पास अभी मिलने के लिए समय नही है। यह उत्तर सुनकर रतनू साहब उसी समय वापस आ गये और उन्होने प्रत्यूतर में दो कवित्त मनहर बना कर प्रेषित किए। कवित्त में इस घटना की तुलना समाज के दो शिरोमणी रत्न सुप्रसिध्द इतिहासकार कविराजा श्यामलदासजी दधवाड़िया जो कि उदयपुर महाराणा के खास सर्वेसर्वा थे और दूसरे जोधपुर के कविराजा श्रीमुरारीदान जी आशिया जो कि जोधपुर कौंसिल के आला अधिकारी भी रहे थे, से की।[…]

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पीठवा चारण और जैतमाल राठौड़

।।दोहा।।
पावन हूवौ न पीठवौ, न्हाय त्रिवेणी नीर।
हेक जैत मिऴियां हूवौ, सो निकऴंक सरीर।।

पीठवा चारण कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गया। इस कुष्ठ रोग से बहुत ही दुःखित होकर उससे छुटकारा पाने के लिए कितने ही तीर्थादि कर आया परन्तु उसका रोग नही गया। ज्यों ज्यों दवा की, मर्ज बढता ही गया। उसने सुना कि रावल मल्लीनाथ का छोटा भाई सिवाणां का राजा जैतमाल जो कि भगवान का बड़ा भक्त था उसके स्पर्श से कोढ रौग दूर हो सकता है।[…]

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डिंगल काव्य केवल वीर रस प्रधान ही नहीं इसमें हास्य रस भी है-मोहन सिंह रतनू

महान भक्त कवि ओपा जी आढा को देवगढ के कुंवर राघव देव चूंडावत ने ऐक घोड़ा भेंट किया। घोड़ा बूढा एवं दुर्बल था।
इस पर कवि ने कुंवर को उलाहना स्वरूप एक गीत लिखा…देखिये सुंदर बिंनगी

धर पैंड न चालै माथो धूणै,
हाकूं केण दिसा हैराव।
दीधो सो दीठो राघव दे,
पाछो ले तूं लाख पसाव।।1[…]

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बस!करोड़ इता ई होवै!!

बारठ दूदाजी रै च्यार बेटा होया-महपोजी, चाहड़जी, थिरोजी अर अमरोजी। थिरोजी अर अमरोजी कविवर्य चांनणजी खिड़िया रा भाणेज हा। इणी थिरोजी रो तोगोजी अर तोगोजी रै बारठ शंकरदासजी अथवा बारठ शंकरजी होया।

शंकरजी प्रतिभा संपन्न अर प्रज्ञा पुरूष होया। उण दिनां बीकानेर माथै महाराजा रायसिंह जी रो राज। रायसिंहजी काव्य प्रेमी अर उदार मिनख हा। बारठ शंकर आपरी रचना “सूर दातार रो संमादो” जैड़ी छोटी पण भावां सूं उटीपी रचना लेयर रायसिंहजी रै अठै हाजिर होया अर रचना सुणाई-

तन वीजूझल़ पल़ समल़, सिव कमल़ हंस.हूर।
ऐता दीन्हां बाहिरो, मोख न पावै सूर।।
जल़ थल़ महियल़ पसु पँखी, सूर घणा ई होय।
दाता मानव बाहिरो, सुण्य़ो न दीठो कोय।।

महाराजा रायसिंहजी इण रचना सूं इता रीझिया कै हाथोहाथ आपरै दीवाण करमचंद बच्छावत नैं आदेश दियो कै कवि नै करोड़ पसाव कियो जावै! पण दीवाण सोचिय़ो कै दरबार नै एहसास करायो जावै कै करोड़ रुपिया कोई बापड़ा नीं होवै ! जिको इणविध कवितावां माथै लुटाया जावै![…]

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महाराणा प्रतापसिंहजी की वीरोचित उदारता! – राजेंद्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर

हल्दीघाटी रा समर होवण में ऐक दोय दिनां री ढील ही, दोनों ओर री सेनावां आपरा मौरचा ने कायम कर एक बीजा री जासूसी अर सैनिक तैयारियां री टौह लेवण ने ताखड़ा तोड़ रैयी ही। जंगी झूंझार जौधारां रो जोश फड़का खावण ने उतावऴो पड़रियो हो। राणाजी रा मोरचा तो भाखरां रै भीतर लागियोड़ा हा नै मानमहिप रा खुलै मैदानी भाग मे हा। लड़ाई होवणरै दो दिन पहली मानसिंहजी शिकार खेलण थोड़ाक सा सुभट साथै लैय पहाड़ां रै भीतरी भाग मे बड़ गिया। राणाजी रा सैनिक जायर राणाजी ने आ कही कि हुकुम इण हूं आछो अवसर कदैई नहीं मिऴेला अबार मानसिंहजी ने मारदेवां का कैद कय लेवां। इण बात पर राणाजी आपरी वीरता री उदारता दिखाय आपरा सुभटां ने पालर कैयो क आंपणै औ कायरता रो करतब नीं करणो है। आंपा धर्म रा रक्षक हां अर भगवानरा भगत हां जणैई आंपांरी बिजै हुवै है। महाराणाजी री ई उदारता रो बरणाव कवि केसरीसिंहजी सौदा रा मुख सूं।[…]

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जिणरा घोड़ा समंदां पीवै! उण आगे तल़ाब री कांई जनात?

महाराजा मानसिंह आमेर अर महाराणा प्रताप राजस्थान रै इतिहास में ई नीं अपितु भारतीय इतिहास में चावा। एक री खाग पातसाही स्थापित करण नै उठी तो दूजोड़ै री तरवार रजवट रै वट री रुखाल़ी सारू। दोनूं ई आपरी स्वामीभक्ति नै समर्पित। मानसिंह पातसाह नै स्वामी मानियो तो पातल इकलिंग रो दीवाण। वि.सं 1629 में डूंगरपुर नै धूंसतो कुंवर मानसिंह जद वि.सं 1630 रै आसाढ में उदयपुर ढूकियो तो उठै महाराणा प्रताप घणा कोड किया अर गोठ करी। भोजन री वेल़ा प्रताप पेट दूखण रो ओल़ावो लेय मानसिंह रै भेल़ा नीं बैठिया। आ बात मानसिंह नै अखरगी। उणां चढतां कैयो कै “हूं बेगो ई आवूंलो !! अर आवतो महाराणा रै पेट री ओखद ई लाऊंलो!!” महाराणा ई कैय दियो कै “जे थे थांरै फूंफै साथै आवोला! तो ऐ घोड़ा अर राजपूत अठै ईज स्वागत में तैयार मिलेला अर जे एकला आवोला तो मालपुरै तक साम्हा आय स्वागत करैला!”

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बाई पद्मा अर वीर अमर सिंह

बीकानेर रा राजाजी रायसिंह जी रा भाई अमर सिंह जी हा उण बखत अकबर अर आमै खटपट व्हैगी ईण खातर अमरसिंह नै पकड़ण सारूं बादसा अकबर आरबखां नै अमरसिंह नै पकड़ लावा रो हुकम दीधो। अमरसिंह रा बड़ा भाई पिरथीराजी अकबर रै दरबार में हाँ। वां ओ हुकम सुण बादसा ने अरज कीधी।
“म्हारौ भाई अमरु हजरत रे वेमुख है जिण री तो उण ने सजा मिलणी चावै। पण वो यां रै हाथे हरगिज नीं आवैलां। ऐ पकड़वा वाळा मारिया जावेला। आ तावेदार री अरज, हजरत गांठ बांध लिरावै।”
अकबर बोल्यो “म्है ईणनै गिरफ्तार कर दिखाऊंला।”

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गीत कोठारियां री अनीति रौ – जनकवि ऊमरदान लाळस

ऐक गीत उमरदानजी लाऴस री दबंगता दरसावतो, जिणमें तीन कोठारी बाणियां रा माजाया भाई, चारणां रा मुंदियाड़ ठिकाणा में घणी रापटरोऴ मचाय लूटणो शुरु करियो अर बठां रा ठाकुर साहब चैनसिंहजी बारहठ ने घणा दुखी करिया। सेवट आ बात उमर कवि कनै पूगी। कवि मारवाड़ रा तत्कालीन मुसाहब आला सर प्रताप रा खास मानिता हा, वै निडरता दिखावता थका बाणियां रो हूबोहूब गीत बणाय सर प्रतापसा ने खऴकायो अर कोठारियां री कामदारी ने खोस जेऴ में न्हाक मुंदियाड़ ने बचाई।

।।गीत – बड़ी सांणौर।।
पुत्र वणक त्रहुं भ्रात अन्याव रा पूतळा,
छिद्र कलकता तक न को छांनां।
जुलम री करी वातां जिके जणावूं
कळपतरु सुणीजे पता कांनां।।1।।[…]

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आशिया प्रभुदानजी भांडियावास !

आशिया प्रभसा रो जसौल ठिकाणै म सदा सनातनी सीर, रावऴसा व बाजीसा एक बीजा रा दुख सुख रा साथी, बाजीसा न देखियां बिना रावऴसा ने चैननंई मिऴै अर बाजीसा रो बीजी जागां मन नीं लागे।
एकर प्रभसा सियाऴा रा दिना आपरै घरै एक तगड़ो तियार हुयैड़ो खाजरु, संधीणा री सोच अर करियो अर आपरा कीं साथियां ने भी निमतिया, साथी वांरी कूंत हूं घणा पूगग्या, बीं मां सूं आधे सूं घणो तो रात ने ई जिमकायगा व बचियौड़ा ने एक ऊंची जागां टांक दियौ अर बै लोग निंशंक सोयग्या, रातै एक मिनड़ी आयर बचियौड़ा भाग ने खायगी, प्रभसा रै संधीणा री मनसा मन में ई रैयगी, भाई सैण पाड़ोसी तथा भायला बाजीसा ने संधीणा रा ताना देवण लागा।प्रभसा ईरा उपाय में जसोल रावऴसा कने एक गीत लिखर ऊंठ सवार रे साथै भेजियो।

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