देस-देस रा दूहा-मोहन सिंह रतनू

ऊंचो तो आडावल़ो, नीचा खेत निवांण।
कोयलियां गहकां करै, अइयो धर गोढांण।।
उदियापुर लंजो सहर, मांणस घण मोलाह।
दे झोला पाणी भरे, रंग रे पीछोलाह।।
गिर ऊंचा ऊंचा गढा, ऊंचा जस अप्रमाण।
मांझी धर मेवाड. रा, नर खटरा निरखांण।।
जल ऊंडा थल ऊजला, नारी नवले वेस।
पुरख पटाधर नीपजै, अइयो मुरधर देस।।[…]

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डिंगल काव्य केवल वीर रस प्रधान ही नहीं इसमें हास्य रस भी है-मोहन सिंह रतनू

महान भक्त कवि ओपा जी आढा को देवगढ के कुंवर राघव देव चूंडावत ने ऐक घोड़ा भेंट किया। घोड़ा बूढा एवं दुर्बल था।
इस पर कवि ने कुंवर को उलाहना स्वरूप एक गीत लिखा…देखिये सुंदर बिंनगी

धर पैंड न चालै माथो धूणै,
हाकूं केण दिसा हैराव।
दीधो सो दीठो राघव दे,
पाछो ले तूं लाख पसाव।।1[…]

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गीत राठोड़ पाबूजी धांधळोव रो – आसिया बांकीदास रो कह्यो

प्रथम नेह भीनौ महा क्रोध भीनौ पछै,
लाभ चमरी समर झोक लागै।
रायकवरी वरी जेण वागै रसिक,
वरी घड कवारी तेण वागै।।

हुवे मगळ धमळ दमगळ वीरहक,
रग तूठो कमध जग रूठो।
सघण वूठो कुसुम वोह जिण मौड सिर,
विखम उण मौड सिर लोह वूठो।।[…]

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चाळराय चाळकनेची रो डिंगळ गीत – कवि केसरदानजी खिडिया

॥गीत – प्रहास साणोर॥
चरै मां संदशा करै डसण विधि चोगणी,
खसण विध नोगणी धरै खूनां।
सोगणी खितारै धाक चढि आसुरां,
जोगणी चितारै वयण जूनां॥1॥

आज म्है आविया माढ पग अबरखे,
डबर कै छांडि पग मती डागो।
दीसहत खबर कै घणो जग देखसी,
बीसहथ जबर कै देखि बागौ॥2॥[…]

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गूदड़ी वाले बाबा गणेशदास जी !!

आज से लगभग अस्सी नब्बे वर्ष पहले एक महान संत जयपुर के आसपास विद्यमान थे, जो गूदड़ीवाले बाबा के नाम से जाने जाते थे। उनका नाम गणेशदासजी था। वह दादूपंथी महात्मा थे। उस समय में जयपुर के प्रसिध्द गणमान्य लोगौं में बाबा की बड़ी मान्यता व स्वीकार्यता थी, तथा बाबा भी बड़े त्यागी-तपस्वी मनीषी थे। उस समय के संस्कृत के उद्भट विद्वान पं.वीरेश्वरजी शास्त्री ने बाबा का स्तवन इस प्रकार किया था:

निर्द्वंन्द्वो निःस्पृहः शान्तो गणेशः साधुतल्लजः
सानन्दः सर्वदा कन्थाकौपीनामात्रसंग्रहः
अर्थातः बाबा गणेशदास कैसे है निर्द्वन्द्व अर्थात ब्रह्मैक्यभाव-प्राप्त, सुख दुःखादि रहित व किसी प्रकार की इच्छामुक्त, शान्त वृति के साधुजनो में परमश्रेष्ठ व ब्रह्मानन्द में मगन रहते हैं व मात्र[…]

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कलरव रा कमठाण

आछो नरपत, आसियो, चारण वरण चकार।
गाँव गाँव गुंजाय दी, डिंगल री डणकार।।1।।
आछो नरपत आसियों, खरो गुणों री खांण।
कव चारण घण कोडसू, विध विध करे बखाण।।2।।
घटाटोप नभ गरजणा, गांजे डिंगल गाज।
महि बोले कवि मोरिया, नरपत ऊपर नाज।।3।।
नपसा तो नाइस लिखे, ख्वाइश पूरे खूब।
साहित तणै समुद्रमें, दिलजावत हे डूब।।4।।
कोहीनूर नरपत कवि, वैतालिक विद्ववान।
जगमग हीरा जातरां, गिरधर अर गजदान।।5।[…]

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माटी थनै बोलणौ पड़सी – कवि रेवतदान चारण

मूंन राखियां मिनख मरैला।
धरती नेम तोड़णौ पड़सी।।
करणौ पड़सी न्याय छेड़लौ, माटी थनै बोलणौ पड़सी।

कुण धरती रौ अंदाता है, कुण धरती रौ धारणहार ?
कुण धरती रौ करता-धरता, कुध धरती रै ऊपर भार ?
किण रै हाथां खेत-खेत में, लीली खेती पाकै है ?
किण रै पांण देष री गाड़ी, अधबिच आती थाकै है ?
कहणौ पड़सी खरौ न खोटौ, सांचौ भेद खोलणी पड़सी।।
माटी थनै बोलणौ पड़सी।
मूंन राखियां मिनख मरैला।
धरती नेम तोड़णौ पड़सी।।[…]

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जांभा सुजस – कवि भंवरदान माडवा “मधुकर”

।।छंद – त्रिभँगी।।
जन मन जयकारा, धन तन धारा, अवन उचारा अवतारा।
पिंपासर प्यारा, दीन दुलारा, पुन प्रजारा, परमारा।
तपस्या तन तारा, भव पर भारा, भल भंयकारा भूप भया।
परगट परमेश्वर, जय जांभेशवर, निज अवधेश्वर रूप नया।।

नव विसी न्याती, धर्म धराती, वर्ण विनाती विख्याती।
जम्भ देव जमाती, कर्म कराती, मेहनत भाती मन थाती।
खिति पर धन ख्याती, परमल पाती, जबरी जाती सूंप जयो।
परगट परमेश्वर, जय जांभेश्वर, निज अवधेश्वर रूप नयो।।[…]

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छंद भयंकर भ्रमर भुजंगी – कवि भंवरदान माडवा “मधुकर”

।।छंद – भ्रमर भुजंगी।।
जटा धार जंगा, गले में भुजंगा, सती नार संगा, गंगा धार गाजे।
खमे भ्रंग खारी, जमे कांम जारी, भमे रीस भारी लमे चन्द लाजे।
हुरां बीच हाले, चँडी साथ चाले, घटां प्रेम घाले, पटां प्रीत पावे।
अहो ओम कारा, सदा तो सहारा, मधुकर तमारा गुणां गीत गावे।।
कवी जो मधूको, धणी हेत धावे।

नचे खेल नट्टा, छिले अंग छट्टा, गिरां देत गट्टा, सुघट्टा, सुहाणी।
वजे नाद वाजा, अनेकां अवाजा, तपे भांण ताजा तके रीठ तांणी।
धुबे धोम धारां तिके थै ततारां, हजारां तरां ताल, भूमी हिलावे।
अहो ओमकारा, सदा तो सहारा, मधुकर तमारा गुणां गीत गावै।।[…]

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गजल: देख लै – कवि जी. डी. रामपुरिया

🌺गजल🌺
चीरड़ा चुगता गळी गोपाळ देख लै।
पेट सारूं सैंग ही पंपाळ देख लै।।

मोह-माया रो दिनो दिन वाधपो दीसे।
काल कुण देखी है गैला काळ देख लै।।

प्रीत री माळा है काचे सूत में पोई।
रीत रिसती जा रही परनाळ देख लै।।

चींचड़ा कुरसी रै कितरा जोर सूं चिपिया।
लपलपाती जीब गिरती लाळ देख लै।।[…]

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