राजस्थानी लोकसाहित्य में मूल्य-बोध
बाळक रै जनमतां ईं उणरी मां रै मूंढै उण सारू मूल्य री सीख सरू हुज्यावै जकी आखरी सांस तांई साथै रैवै। राजस्थानी लोकगीत ‘बाळो पांख्यां बारै आयो माता बैण सुणावै यूं ’ में राजस्थानी वीर माता आपरै बाळै नैं नाळो मोळती बिरियां मूल्य री सीख देवै-‘बैर्यां री फौजां रा बाळा सीस काट घर आइजे यूं’। इणीं भांत बा मायड़ झूलो झुलावती वेळा ई ‘इळा न देणी आपणी हालरिया हुलराय’ री लोरी गावै। रणांगण सारू जावती बखत आपरै बेटै अर पति दोनां नै अखरावती कैवै कै ‘‘सहणी सबरी हूं सखी दो उर उलटी दाह/ दूध लजाणै पूत सम, वलय लजाणै नाह’’ रण में खेत रैवणियै बेटै सारू त्राहि-त्राहि कर’र रोवण री बजाय वीर माता अंतस सूं अंजस रा आखर उच्चारै ‘बेटा दूध उजाळियो, तू कट पड़ियो जुद्ध/ नीर न आवै नयण पण थण आवै दुद्ध’। राजस्थान री नारी सारू वीर माता अर वीर नारी रो विरुद इणीं कारण है कै वा वीरत री कीरत नैं आपरै जीवणमूल्यां री जड़ मानै।[…]
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