नारी बन तू निडर निर्भया

खुद के भीतर देख निर्भया,
बदल ब्रह्म के लेख निर्भया,
तू सूरज है, तेजपुंज तू,
वहसी तम की रेख निर्भया,
खुद के भीतर देख निर्भया।

भीतर का भय त्याग निर्भया,
जगना होगा, जाग निर्भया,
तेरी ताकत सागर जैसी,
दुष्ट झाग सम पेख निर्भया,
खुद के भीतर देख निर्भया।[…]

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🌹 सबरै घरै दीवाल़ी होसी!!🌹

मन रो तिमिर हरैला दीपक,
उण दिन ही उजियाल़ी होसी!
मिनखपणो होसी जद मंडित ,
देख देश दीवाल़ी होसी!!
🚩
जात -पांत सूं ऊपर उठनै,
पीड़ पाड़ोसी समझेला!
धरम धड़ै में बांटणियां वै,
घोषित उण दिन जाल़ी होसी!![…]

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भारत नैं आज संभाळांला

सूरज जद स्याह अंधेरी सूं,
रंग-रळियां करणो चावै है।
चांदै नैं स्यामल-रजनी रै,
आँचळ में आँणद आवै है।

इसड़ी अणहोणी वेळा में,
होणी रा गेला कद दीखै।
कहद्यो अै तारा टाबरिया,
कुणनैं देखै अर के सीखै?[…]

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प्रताप की बलिदान कहानी !

सुन आर्यभूमि का आर्तनाद, उठ गए देश के दीवाने।
जल उठी काल लपटें कराल, आ गए शमा पर परवाने।।
चुप रह ना सका सौदा प्रताप, जग उठा जाति का स्वाभिमान।
जगती तल के इतिहासों में, गूँजे थे जिसके कीर्ति-गान।।
आखिर चारण का बच्चा था, वह वीर “केसरी” का सपूत।
पद दलित देश की धरती पर, वह उतरा बनकर क्रांतिदूत।।[…]

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लोहित मसि में कलम डुबाकर कवि तुम प्रलय छंद लिख डालो

लोहित मसि में कलम डुबाकर कवि तुम प्रलय छंद लिख डालो।।

अम्बर के नीलम प्याले में ढली रात मानिक मदिरा-सी।
कर जग को बेहोश चाँदनी बिखर गई मदमस्त सुरा-सी।
तुमने उस मादक मस्ती के मधुमय गीत बहुत लिख डाले।
किन्तु कभी क्या देखे तुमने वसुंधरा के उर के छाले।
तुम इन पीप भरे छालों में रस का अनुसन्धान कर रहे।
मौत यहाँ पर नाच रही तुम परियों का आव्हान कर रहे।

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तुम कहते संघर्ष कुछ नहीं

तुम कहते संघर्ष कुछ नहीं, वह मेरा जीवन अवलंबन !

जहाँ श्वास की हर सिहरन में, आहों के अम्बार सुलगते !
जहाँ प्राण की प्रति धड़कन में, उमस भरे अरमान बिलखते !
जहाँ लुटी हसरतें ह्रदय की, जीवन के मध्यान्ह प्रहर में !
जहाँ विकल मिट्टी का मानव, बिक जाता है पुतलीघर में !
भटक चले भावों के पंछी, भव रौरव में पथ बिसार कर !
जहाँ ज़िंदगी साँस ल़े रही महामृत्यु के विकट द्वार पर !

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मैं प्रलय वह्नि का वाहक हूँ !

मैं प्रलय वह्नि का वाहक हूँ !
मिट्टी के पुतले मानव का संसार मिटाने आया हूँ !

शोषित दल के उच्छवासों से, वह काँप रहा अवनी अम्बर !
उन अबलाओं की आहों से, जल रहा आज घर नगर-नगर !
जल रहे आज पापों के पर, है फूट रहा भयकारी स्वर !
इस महा-मरण की वेला में त्यौहार मनाने आया हूँ !
मिट्टी के पुतले मानव का संसार मिटाने आया हूँ !

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मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा !

मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा !

सिकुड़ती परछाइयाँ, धूमिल-मलिन गोधूलि-बेला !
डगर पर भयभीत पग धर चल रहा हूँ मैं अकेला !
ज़िंदगी की साँझ में मधु-दिवस का यह गान कैसा ?
मोह-बंधन-मुक्त मन पर स्नेह-तंतु-वितान कैसा ?

मरण-बेला में मिलन-संगीत लेकर क्या करूँगा ?
मैं किसी आकुल-ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा ![…]

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आज होली जल रही है !

राज्य-लिप्सा के नशे में, विहँसता है आज दानव !
दासता के पात में जो, पिस रहा है आज मानव !
आज उसकी आह से धन की हवेली हिल रही है !
आज होली जल रही है ![…]

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आज जीवन गीत बनने जा रहा है !

आज जीवन गीत बनने जा रहा है !
ज़िंदगी के इस जलधि में ज्वार फिर से आ रहा है !

छा गई थी मौन पतझड़ की उदासी,
गान जब से बन गए मेरे प्रवासी !
आज उनको मुरलिका में पुनः कोई गा रहा है !
आज जीवन गीत बनने जा रहा है ![…]

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