प्रताप की बलिदान कहानी !

सुन आर्यभूमि का आर्तनाद, उठ गए देश के दीवाने।
जल उठी काल लपटें कराल, आ गए शमा पर परवाने।।
चुप रह ना सका सौदा प्रताप, जग उठा जाति का स्वाभिमान।
जगती तल के इतिहासों में, गूँजे थे जिसके कीर्ति-गान।।
आखिर चारण का बच्चा था, वह वीर “केसरी” का सपूत।
पद दलित देश की धरती पर, वह उतरा बनकर क्रांतिदूत।।[…]

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लोहित मसि में कलम डुबाकर कवि तुम प्रलय छंद लिख डालो

लोहित मसि में कलम डुबाकर कवि तुम प्रलय छंद लिख डालो।।

अम्बर के नीलम प्याले में ढली रात मानिक मदिरा-सी।
कर जग को बेहोश चाँदनी बिखर गई मदमस्त सुरा-सी।
तुमने उस मादक मस्ती के मधुमय गीत बहुत लिख डाले।
किन्तु कभी क्या देखे तुमने वसुंधरा के उर के छाले।
तुम इन पीप भरे छालों में रस का अनुसन्धान कर रहे।
मौत यहाँ पर नाच रही तुम परियों का आव्हान कर रहे।

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तुम कहते संघर्ष कुछ नहीं

तुम कहते संघर्ष कुछ नहीं, वह मेरा जीवन अवलंबन !

जहाँ श्वास की हर सिहरन में, आहों के अम्बार सुलगते !
जहाँ प्राण की प्रति धड़कन में, उमस भरे अरमान बिलखते !
जहाँ लुटी हसरतें ह्रदय की, जीवन के मध्यान्ह प्रहर में !
जहाँ विकल मिट्टी का मानव, बिक जाता है पुतलीघर में !
भटक चले भावों के पंछी, भव रौरव में पथ बिसार कर !
जहाँ ज़िंदगी साँस ल़े रही महामृत्यु के विकट द्वार पर !

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मैं प्रलय वह्नि का वाहक हूँ !

मैं प्रलय वह्नि का वाहक हूँ !
मिट्टी के पुतले मानव का संसार मिटाने आया हूँ !

शोषित दल के उच्छवासों से, वह काँप रहा अवनी अम्बर !
उन अबलाओं की आहों से, जल रहा आज घर नगर-नगर !
जल रहे आज पापों के पर, है फूट रहा भयकारी स्वर !
इस महा-मरण की वेला में त्यौहार मनाने आया हूँ !
मिट्टी के पुतले मानव का संसार मिटाने आया हूँ !

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मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा !

मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा !

सिकुड़ती परछाइयाँ, धूमिल-मलिन गोधूलि-बेला !
डगर पर भयभीत पग धर चल रहा हूँ मैं अकेला !
ज़िंदगी की साँझ में मधु-दिवस का यह गान कैसा ?
मोह-बंधन-मुक्त मन पर स्नेह-तंतु-वितान कैसा ?

मरण-बेला में मिलन-संगीत लेकर क्या करूँगा ?
मैं किसी आकुल-ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा ![…]

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आज होली जल रही है !

राज्य-लिप्सा के नशे में, विहँसता है आज दानव !
दासता के पात में जो, पिस रहा है आज मानव !
आज उसकी आह से धन की हवेली हिल रही है !
आज होली जल रही है ![…]

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आज जीवन गीत बनने जा रहा है !

आज जीवन गीत बनने जा रहा है !
ज़िंदगी के इस जलधि में ज्वार फिर से आ रहा है !

छा गई थी मौन पतझड़ की उदासी,
गान जब से बन गए मेरे प्रवासी !
आज उनको मुरलिका में पुनः कोई गा रहा है !
आज जीवन गीत बनने जा रहा है ![…]

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भव का नव निर्माण करो हे !

भव का नव निर्माण करो हे !
यद्यपि बदल चुकी हैं कुछ भौगोलिक सीमा रेखाएँ;
पर घिरे हुए हो तुम अब भी इस घिसी व्यवस्था की बोदी लक्ष्मण लकीर से !
रुद्ध हो गया जीवन का अविकल प्रवाह तो;
और भर गया कीचड़ के लघु कृमि कीटों से गलित पुरातन संस्कृति का यह गन्दा पोखर ![…]

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आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

नभ में घिरती मेघ-मालिका,
पनघट-पथ पर विरह गीत जब गाती कोई कृषक बालिका !
तब मैं भी अपने भावों के पिंजर खोल उड़ाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?[…]

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आग नफ़रत री बुझाओ

आग नफ़रत री बुझाओ, आ समय री माँग है।
हेत री जाजम जमाओ, आ समय री माँग है।
मौन तोड्यां बिन मनां री ग्रन्थियां उळझै घुळै।
परस्पर बोलो-बुलाओ, आ समय री माँग है।
बारणा अर बारियाँ ढक, सोवणै सूं नीं सधै
आज घर सूं बा’र आओ, आ समय री माँग है।
दोष देकर दूसरां नैं, पाक-दामण मत बणो
आंगळी खुद पर उठाओ, आ समय री माँग है।[…]

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