भव का नव निर्माण करो हे !

भव का नव निर्माण करो हे !
यद्यपि बदल चुकी हैं कुछ भौगोलिक सीमा रेखाएँ;
पर घिरे हुए हो तुम अब भी इस घिसी व्यवस्था की बोदी लक्ष्मण लकीर से !
रुद्ध हो गया जीवन का अविकल प्रवाह तो;
और भर गया कीचड़ के लघु कृमि कीटों से गलित पुरातन संस्कृति का यह गन्दा पोखर ![…]

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आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

नभ में घिरती मेघ-मालिका,
पनघट-पथ पर विरह गीत जब गाती कोई कृषक बालिका !
तब मैं भी अपने भावों के पिंजर खोल उड़ाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?[…]

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आग नफ़रत री बुझाओ

आग नफ़रत री बुझाओ, आ समय री माँग है।
हेत री जाजम जमाओ, आ समय री माँग है।
मौन तोड्यां बिन मनां री ग्रन्थियां उळझै घुळै।
परस्पर बोलो-बुलाओ, आ समय री माँग है।
बारणा अर बारियाँ ढक, सोवणै सूं नीं सधै
आज घर सूं बा’र आओ, आ समय री माँग है।
दोष देकर दूसरां नैं, पाक-दामण मत बणो
आंगळी खुद पर उठाओ, आ समय री माँग है।[…]

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क्यूं राखै करड़ाण अणूती

क्यूं राखै करड़ाण अणूती
छोड परी आ बाण अणूती
धड़ो करंतां ध्यान राखजे
निजर-ताकड़ी काण अणूती
कुळपतराई कारण काया
खाली ओगण खाण अणूती
चाव-चूंटियो काढ़ माट सूं
छाछ मती ना छाण अणूती[…]

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आज वार इतवार

आज वार इतवार, आज घर-बार संभाळो।
आज वार इतवार, टूर पसवाड़ै टाळो।
आज वार इतवार, नहीं कित आणो-जाणो।
आज वार इतवार, न को महमान बुलाणो।
बैठ कर आज परिवार बिच, बिनां बात बातां करो।
गजराज तणी इण गल्ल पर, ध्यान नेक मीतां धरो।।[…]

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माणस अर माछर

ओ छोटो सो जीव रंगीलो, बात होळै सी कह्वै कान में।
करै कुचरणी, नींद उड़ावै, रक्तपान नै धार ध्यान में।।
ऊमस, गरमी हुवो कितीही, भांवै सांस निकाळै आवै।
आँख लागतां पाण जुझारू, सागण जूनी तान सुणावै।।
कड़कड़ ठंड दांत कड़कावै, भांवै बरसै मूसळाधार।
ओ नीं सोवै नीं सोवण दे, ओ छोटो मोटो सरदार।।[…]

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डिंगल फेशन – कवि भंवरदान गढवी “मधुकर”

इण पढ्यो लिख्यो री पंगत में, जुनोड़ा आखर कुण जांणे।
नखरा कर नये जमांने रा, तिरछी हद रागां लो तांणे।।
जा जोर तमासा कर जितरा, जोवे जनता मन जोकरिया।
वाजे आधुनिक वायरियो, डिंगल फेशन कर डोकरिया।।१

ऊचे शब्दां रा अरथ करे, वो कूंत करणिया रैया कठे।
जुनी भाषा ने जांणणिया, अब देख किता सच कया अठे।।
तड़का बाजे लै ताड़ी रा, हाका कर लड़का होकरिया।
वाजे आधुनिक वायरियो, डिंगल फेशन कर डोकरिया।।२[…]

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कुबद्ध कमाई छोड बावल़ा!

कुबद्ध कमाई छोड बावल़ा!
मतकर भ्रष्टां होड बावल़ा!!
च्यार दिनां री देख चांदणी!
फैंगर मतकर कोड बावल़ा!!

लुकै नहीं अपराध लाखविध!
कूटीजै फिर भोड बावल़ा!!
लोकतंत्र में बिनां दावणै,
लेय तपड़का तोड बावल़ा![…]

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तूं मंदर-मंदर भटक मती!!

तूं मंदर-मंदर भटक मती!
यूं हर आगल़ सिर पटक मती!
टांग मती अपणायत ऊंची!
भाव स्नेह रा गटक मती!!
आश लियां आवै विश्वासी!
देय निराशा झटक मती!!!
ग्यान-गहनता बातां रूड़ी!
पतियायां तूं कटक मती!![…]

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टकै-टकै मत बेच

मोत्यां मूंघो माण जगत में
अर मोत्यां री कीमत भारी।
टकै-टकै मत बेच बावळा, आ जिंदगाणी लाख टकां री।।

लख चौरासी भटक बितायां
मिनख जूण रो मोको आवै।
करम देख करतार पूरबला
करमां सारू काज भुळावै।।
कर करणी भंूडी या सखरी
बही लिखीजै बंदा थारी।
टकै-टकै मत बेच बावळा, आ जिंदगाणी लाख टकां री।।01।।

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