विश्वासां रै गळै कटारी

जूत्यां में पगथळियां वांरी, कियां कटाणी, आ सीखां।
विश्वासां रै गळै कटारी, कियां चलाणी, आ सीखां।

लज्जा रै चिळतै लूगडि़यै, पैबंदां रै जाळ फंसेड़ी।
(इण) कारी वाळी नैं महतारी, नहीं बताणी, आ सीखां।[…]

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काश हम भी प्रताप बने होते – “रुचिर”

मुझसे उसने पूछा होता,
मैं मस्तक पर तिलक लगाती।
घोड़ी पर बिठलाकर उसका,
चुम्बन लेती विदा कराती।
पर वह स्वतन्त्रता का राही माँ से चुप चुप चला गया।
बिन पूछे ही चला गया।।[…]

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साच माग लीजिए

परे रहेंगे मकान व दुकान सारी यहां,
सावधानी मनमानी काम नहीं आएगी।
कारखाने व खजाने जड़े ही रहेंगे मीत,
माया संची जो तो तेरे अर्थ कछु नाएगी।
खड़े ही रहेंगे अश्व रथ गज शाला बीच,
आ काया भाई उभै बांसन में समाएगी।
अच्छे काम किए है तो बात एक सत्य मनो,
कछु ना रहेगो गीध याद रह जाएगी!!

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हमार रौ हाळ – जनकवि ऊमरदान लाळस

जनकवि ऊमरदान जी लालस द्वारा लगभग १०० पूर्व लिखी यह कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। इसमें कवि ने अपने समय के नैतिक पतन का दो टूक शैली में वर्णन किया है।

(राग प्रभाती बिलावल)

खारी रे आ समें दुखारी, हाहा बड़ी हत्यारी रे।।टेर।।

मोटा घरां म्रजादा मिटगी, बंगळां रै सौ बारी रे।
गोला जुगळी मांय गई जद, नसल बिगड़ गई न्यारी रे।।खारी…।।1।।

होटल मांई खाणौ हिळतां, बिटळां बुरी बिचारी रे।
मांनव धर्म शास्त्र री महिमा, सुरती नहीं समारी रे।।खारी…।।2।।

घुड़दौड़ां सूं ढूंगा घसग्या, नामरदी फिर न्यारी रे।
लाखां रुपया लेखे लागा, कोई न लागी कारी रे।।खारी…।।3।।[…]

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नवजीवन संचार करो

प्रतिकूलन से डरने वाले,
कभी किसी के नहीं हुए।
अनुकूलन की राह देखते,
डर डर मर मर सदा जिए।।

बहती धारा के अनुगामी,
सही किनारा कब पाते।
जहां लहर ले जाती है,
वे उसी किनारे पर जाते।।[…]

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रल़ियाणो राजस्थान जठै

रंग बिऱंगी धरा सुरंगी, जंगी है नर-नार जठै।
सदियां सूं न्यारो निरवाल़ो, रल़ियाणो राजस्थान जठै।

रण हाट मंडी हर आंगणियै, कण-कण में जौहर रचिया है।
पल़की बै ताती तरवारां, भड़ वीरभद्र सा नचिया है।
वचनां पर दैवण प्राण सदा, जुग-जुग सूं रैयी रीत अठै।
रल़ियाणो राजस्थान जठै।।1[…]

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दुख का कारण नहीं बनेंगे

जो हरदम आगे रहते हैं,
आगे ही शोभा पाते हैं।
वो एक कदम भी रुक जाएं,
तो सब राही रुक जाते हैं।।

मंजिल को पाना मुश्किल है,
उसूल निभाना और कठिन।
सुख के तो अनगिन साथी हैं,
हैं असल परीक्षक दुख के दिन।।[…]

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डीडवाना की गै’र

हाकम की होली, दिल-देहरी रंगोली,
खेले रसियां की टोली, लिए हाथों ही में चंग है।
बाजत मृदंग, थेई-थेई-ता-ता-थ्रग,
मिल करे हुड़दंग, वाको नाचे अंग-अंग है।
डोलची को पानी, लागे पीठ या पेशानी,
जातें याद आवै नानी, दुनी देख-देख दंग है।
कहे “गजादान”, आओ देखने को डीडवाना,
डोलची की गै’र, मेरे शहर की उमंग है।।[…]

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कल़ायण !

धरती रौ कण-कण ह्वे सजीव, मुरधर में जीवण लहरायौ।
वा आज कल़ायण घिर आयी, बादळ अम्बर मं गहरायो।।

वा स्याम वरण उतराद दिसा, “भूरोड़े-भुरजां” री छाया !
लख मोर मोद सूँ नाच उठ्यौ, वे पाँख हवा मं छितरायाँ।।

तिसियारै धोरां पर जळकण, आभै सूँ उतर-उतर आया।
ज्यूँ ह्वे पुळकित मन मेघ बन्धु, मुरधर पर मोती बरसाया।।[…]

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