इन्द्रवा रा सोरठा – डॉ. शक्तिदान जी कविया कृत

नर नारी मे नेह. घर मे व्हे संपत घणो।
गिणो सुरग ज्यू गेह. अंतस भरियो इन्द्रवा।।१
धौलो दूध न धार, सब पीलो सोनो नही।
सांग घणा संसार, ओलखणा झट इन्द्रवा।।२
घण सुख री घडियोह, सगली दुनिया साथ दे।
पण अबखी पडियोह, आवै विरला इन्द्रवा।।३
माथे रो अभिमान. पगां पडतो पेखियो।
सब दिन व्हे न समान.आ मत भूले इन्द्रवा।।४

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बूढा घर री साख हुवै

बूढां रो अपमान कर्यां सूं, मिनख जमारो खाख हुवै।
बूढा थारी-म्हारी सोभा, (अै) बूढा घर री साख हुवै।।

इक दिन सबनै बूढो होणो, इणमें मीन न मेख सुणोे।
चार दिन रो जोश जवानी, पछो बुढापो पेख गुणोे।।
शैशव, बाळपणो’र जवानी, अगलो आश्रम दे ज्यावै।
ओ बुढापो कछु नहीं देवै, जीव तकातक ले ज्यावै।
मिटसी महल, ठहरसी गाडी, आं रिपियां री राख हुवै।
बूढा थारी-म्हारी सोभा, (अै) बूढा घर री साख हुवै।। 01।।[…]

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माया पंचक

कोउ करत उपवास, कोउ अन खात अलूणा|
कोउ खात फल कंद, कोउ बोलत कोउ मूना|
कोउ ठाडे तप करत, कोउ ऊंधै सिर झूलत|
मन क्रत कूं सत मान, मोख मारग से भूलत|
वासना ह्रदय त्यागे बिना, विफल करत बनवास है|
कहै ब्रह्ममुनि हरि प्रगट बिन, सब माया के दास है||१ […]

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जगमाल के सवैया

मित्र जगमाल सिंह बालुदान जी सुरताणिया को संबोधित संबोधन काव्य

पल़ बीत रही पल ही पल में अब आल़स चारण तू तजरे|
मत सोच करे मन में सुण बांधव है मथ हेक रदं गज रे।
प्रिय मोदक ,पुत्र शिवा ,वरदायक तू गण नायक नें भजरे|
जगमाल !सहायक मूषक वाहक,चारभुजायक तौ कज रे||१ […]

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स्वार्थ रूपी होलिका की गोद में जीवनमूल्य रूपी प्रहलाद का भविष्य

रंग, उमंग और हुड़दंग के रंगारंग पर्व होली की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं। हमारे पूर्वजों ने जीवन के हर कदम पर कुछ प्रतीकात्मक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए हमें जीवन जीने की सीख प्रदान की है। होली से जुड़े कुछ प्रतिमानों पर आज विचार करने की जरूरत आन पड़ी है। “जमाना बदलता है तो सब कुछ नहीं तो भी बहुत कुछ बदल जाता है” यह उक्ति हर देश, काल एवं परिस्थिति पर सही-सही चरितार्थ होती रही है लेकिन हाल ही में देश-दुनिया में घटित अनेक घटनाएं संवेदनशील लोगों के लिए अत्यन्त पीड़ादायक हो गई है। जानबूझ कर जिंदा मख्खी निगलना आम […]

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हिंद की राजपुतानीया – कवि दुला भाया “काग”

रंगम्हेल मे बानियां बो’त रहे,
एक बोल सुने नही बानियां का,
दरबार मे गुनिका नाच नचे,
नही तान देखे गुनकानियां का,
नरनार प्रजा मिली पांव नमे,
नही पांव पेसाराय ठानियां का,
जग जिनका जीवन पाठ पढे,
सोई जीवन राजपुतानियां का…..(1)

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जा रै डोफा चाखू कोट रो ई कोजो लगायो !

आधुनिक सोच राखणिया अर सामंती जीवण मूल्यां सूं अजाण लोग आपरी मूंछ ऊंची राखण सारु जिण भांत सामंतवाद नैं भूंडै उणां नैं शायद जमीनी धरातल़ रो लेस मात्र ई ज्ञान नीं है या उणां किताबां सूं ओ ई ज्ञान पायो है कै उणकाल़ अर उण शासकां नैं विगोवो। ओ ई कारण है कै ऐड़ै लोगां नैं बै ठाकुर शोषक, क्रूर अमानवीय व्यवहार वाल़ा अर प्रजा रै सारु राकस रै समरूप निगै आवै। पण एक दो नै छोड र बाकी रा शासक दिल रा दरियाव, मिनखपणै सूं मंडित अर दया री प्रतिमूर्त हा। ऐड़ो ई एक किस्सो आप री निजर कर […]

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डांग अर डोको

कांई कैयो आप
आपरै कन्नै डांग है !
बा ई बंध्यां वाल़ी
नींगल़्योड़ी!
पण किणरै सारु
बता सको हो आप ?
म्हनै तो लागै है
इण डोकै रै आगै
आपरी डांग बापड़ी है
निजोरी है।
आप ई जाणो हो आ बात ! […]

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