इन्द्रवा रा सोरठा – डॉ. शक्तिदान जी कविया कृत
नर नारी मे नेह. घर मे व्हे संपत घणो।
गिणो सुरग ज्यू गेह. अंतस भरियो इन्द्रवा।।१
धौलो दूध न धार, सब पीलो सोनो नही।
सांग घणा संसार, ओलखणा झट इन्द्रवा।।२
घण सुख री घडियोह, सगली दुनिया साथ दे।
पण अबखी पडियोह, आवै विरला इन्द्रवा।।३
माथे रो अभिमान. पगां पडतो पेखियो।
सब दिन व्हे न समान.आ मत भूले इन्द्रवा।।४