दीकरा – गज़ल
तूं तो ग्यो परदेस दीकरा।
सूनो करग्यो नेस दीकरा।।
कदै आय पाती विलमाती।
अब बदल़्यो परिवेस दीकरा।।
गया ठामडा भाज दीकरा!
रांधूं कीकर आज दीकरा!
छाछ मांगनै करूं राबड़ी
नहीं घरां पण नाज दीकरा!
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तूं तो ग्यो परदेस दीकरा।
सूनो करग्यो नेस दीकरा।।
कदै आय पाती विलमाती।
अब बदल़्यो परिवेस दीकरा।।
गया ठामडा भाज दीकरा!
रांधूं कीकर आज दीकरा!
छाछ मांगनै करूं राबड़ी
नहीं घरां पण नाज दीकरा!
घर रो दारमदार दीकरी।
म्हारो सुक्रत कार दीकरी।।
तुलसी आंगणद्वार दीकरी!
पूजूं बारंबार दीकरी!
आँगण में अवतार दीकरी।
म्हारो सब संसार दीकरी।
बैठी घर रे बार डोकरी।
किणनें रही निहार डोकरी।।
थाकी बैठी आज डोकरी।
राखी घर री लाज डोकरी।।
हाथां पकड़्यो भाल डोकरी।
मोडा खाग्या माल डोकरी।।[…]
खल़ पर खीजै खार कर, खय करवा खुंखार।
भय हरणी रण रंजणी, तनें नमन तलवार।।१
अशरणशरणी अंबिका, हुई सदा रह हाथ।
रे!रणचंडी रीझजै, मनसुध नामूं माथ।।२
धावड बण बिच ध्रागडै, सूरां रखै संभाल़।
रणचंडी! खंडी खल़ां, , करूं नमन किरमाल़।।३[…]
सजधज हालां, घूमर घाला, ले रिपियां री थेली।
बैठौ साजण सेठ बजारां, आव सखी! अलबेली।।
हेली हालों भाल़वा, बैठौ कुण बजार।
चख डंडी मन पालडै, जोखै नेह जँवार।।
जोखै नेह जँवार, करै नी बिलकुल धोखो।
बालम रो व्यवहार, चातुरी भरियौ चोखो।
मोठ बाजरी मूंग, बांटतौ भर भर थेली।
किं रूपियां रो काम, हेरतां देसी हेली।।
मन रो भोल़ो, हेत हबोल़ो, फिकर मती कर गैली!
बैठौ साजण सेठ बजारां, आव सखी! अलबेली।।१
चंदा थारी चांदणी, कीकर पडगी मंद?
गोख खडी छै गोरडी, निरखण नें नँद नंद।।१
अली !कली सूं आज कल, रहे न क्यूं रति रंग?
राधा मिसरी री डल़ी, चली श्याम रै संग।२
घनघोर घटा नभ में गरजै,
धुनि जाण नगाड मृदंग बजै।
कलशोर करै पिक, मोर करै नृत, ढेलडियां शिणगार सजै।
डक डौ डक दादुर झिंगुर जाणक, बीण मँजीर बजावणा है।
अनुराग सुराग बिहाग समा दिन पावस रा रल़ियावणा है।
घनश्याम सखी!मन भावणा है।
घनश्याम घणा मन भावणा है।।१ […]
आज रे भौतिकता वादी जुग में ई राजस्थान री इण पावन धरा रे मांय दान री परंपरा री अनवरत गंगा चालू है। जो आदू समै री गंगोत्री सूं कल कल करै है। इण रो परिचय सोशियल मीडिया रे मांय अबार ई थोडा दिन प्हैली वियोडी एक घटना है जिकण औ सिद्ध कर दियौ के आदू पुराणी दान अर दातारी री बातां कोइ दंतकथा या महज किस्सा कहाणी नी हा पण बे चीजां आखर आखर साच ही।
आज मैं बात मांडणी चावूं हूं एक निजानंदी कवि अर घोडां रा सौदागर नीतिराज सिंह सांदू सिहु री जिकण घोडी रो दान एक गुणी कवि मीठे खांजी मीर नें देयर पुराणी दान री परिपाटी नें पुनर्जिवीत करण री कोशिश करी।
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद मे बैठकर,
या वह जगह बता जहां पर खुदा नहीं।
~~मिरज़ा गालिब (1797-1869)
मने करण दे मौलवी, मस्जिद में मदपान।
(या)जगह जगत में बावडौ, जठै नही भगवान॥
~~नरपत आवडदान आशिया “वैतालिक” […]
।।मीठिया रा सोरठा।।
परधन जिकै प्रमांण, ध्रब गिणै नह धूळ सम।।
होवे जिणरी हांण, मालिक रे घर मीठिया।।१।।
निरखै दूजी नार, कामी नर जो काम वश।।
(तो) खांतै हुय खौआर, मुऱख जगमें मीठिया।।२।।
जिकै हणै औ जीव, आमिष कारण नर अठै।।
(तो) निभै न ज्यांरी नींव, मिनखपणा री मीठिया।।३।।