जीत रण बंका सिपाही! – कवि मोहन सिंह रतनू
आज संकट री घडी है।
देश पर विपदा पड़ी है।
कारगिल कश्मीर में,
कन्ट्रोल लाइन लडखड़ी है।
जुध रो बाजै नगारो।
सुण रह्यो संसार सारो।
दोस्ती री आड दुसमण,
पाक सेना अडबड़ी है।[…]
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आज संकट री घडी है।
देश पर विपदा पड़ी है।
कारगिल कश्मीर में,
कन्ट्रोल लाइन लडखड़ी है।
जुध रो बाजै नगारो।
सुण रह्यो संसार सारो।
दोस्ती री आड दुसमण,
पाक सेना अडबड़ी है।[…]
तूं तो भोल़ी भाऴ चिड़कली।
दुनिया गूंथै जाऴ चिड़कली।।
धेख धार धूतारा घूमै।
आल़ै आल़ै आऴ चिड़कली।।
मारग जाणो मारग आणो
हुयगी अब तो गाऴ चिड़कली।।
बुत्ता दे बस्ती भरमावै।
वै ई पैरै माऴ चिड़कली।।[…]
प्रशंसा बहुत प्यारी है,
सभी की ये दुलारी है,
कि दामन में सदा इसके,
खलकभर की खुमारी है।
फर्श को अर्श देती है,
उमंग उत्कर्ष देती है,
कि देती है ये दातारी,
हृदय को हर्ष देती है।[…]
मिनखां सूं अब टऴिया गांव।
भूतां रै संग भिऴिया गांव।।
दूध दही री नदियां बैती
दारू सूं अब कऴिया गांव।।
सल़िया सऴिया नेही होता
करै कुचरणी अऴिया गांव।।
खुद री नींद सोवता उठता।
अब तो है हांफऴिया गांव।।[…]
इळ पर नहचै वो दिन आसी,
गीत रीत रा सो जग गासी,
राख याद घातां री रातां,
उर में मत ना लाय उदासी।
करमहीण रै संग न कोई,
काबो मिलै न मिलणी कासी।
पुरसारथ रो पलड़ो भारी,
इणमें मीन न मेख जरासी।[…]
बध-बध मत ना बोल बेलिया,
बोल्यां साच उघड़ जासी।
मरती करती जकी बणी है,
पाछी बात बिगड़ जासी।।
तू गौरो है इणमें गैला,
नहीं किणी रो कीं नौ’रो।
पण दूजां रै रोग पीळियो,
साबित करणो कद सौ’रो।[…]
नेह रो दरियाव दिवलो,
गेह नै उपहार दे।
श्याम-बदना रात रै,
झट गात नै सिंणगार दे।
तन बाऴ जोबन गाऴ नै,
उपकार रै पथ प्रीत सूं।
ओ जीत रो जयकार दिवलो,
तिमिर नै ललकार दे।।[…]
साची बात कहूँ रे दिवला,
थूं म्हारै मन भावै।
दिपती जोत देख दिल हरखै,
अणहद आणंद आवै।
च्यारुंमेर चड़ूड़ च्यानणो,
तेज तकड़बंद थारो।
जुड़ियाँ नयण पलक नहं झपकै,
आकर्षक उणियारो।[…]
दिवला! इसड़ो करे उजास
जिणमें सकल निरासा जळ कर,
उबरै बधै ऊजळी आस।
मन रो मैल कळुष मिट ज्यावै,
वध-वध दृढै विमळ विश्वास ।
झूठ कपट पाखंड जळै सब,
पाप खोट नहं आवै पास।।[…]
ओढ्यां जा चीर गरीबां रा, धनिकां रौ हियौ रिझाती जा।
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै,
अै लिछमी दीप बुझाती जा !
हळ बीज्यौ सींच्यौ लोई सूं तिल तिल करसौ छीज्यौ हौ।
ऊंनै बळबळतै तावड़ियै, कळकळतौ ऊभौ सीझ्यौ हौ।
कुण जांणै कितरा दुख झेल्या, मर खपनै कीनी रखवाळी।
कांटां-भुट्टां में दिन काढ्या, फूलां ज्यूं लिछमी नै पाळी।
पण बणठण चढगी गढ-कोटां, नखराळी छिण में छोड साथ।
जद पूछ्यौ कारण जावण रौ, हंस मारी बैरण अेक लात।
अधमरियां प्रांण मती तड़फा, सूळी पर सेज चढाती जा।
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै,
अै लिछमी दीप बुझाती जा ![…]