मांडणा
उर रख कोड अपार, रीझ कर त्यार रँगोली।
प्रिया-विष्णु पधार, बहुरि मनुहार सुबोली।
सिंधुसुता सुखधाम, नाम तव है घणनामी।
तोड़ अभाव तमाम, अन्न-धन देय अमामी।
कवि अमर-सुतन ‘गजराज’ कह, मांडै धीवड़ माँडणा।
बेटियां हूंत घर व्है बडा, ओपै मनहर आँगणा।।[…]